नीमच जिले में ई-केवाईसी का बोझ: पंचायत सचिवों पर प्रशासनिक अत्याचार, निलंबन की तलवार से बढ़ता मानसिक तनाव

नीमच, 13 अगस्त 2025: मध्य प्रदेश के नीमच जिले में पंचायत सचिव ई-केवाईसी (इलेक्ट्रॉनिक नो योर कस्टमर) प्रक्रिया के कठोर लक्ष्यों के कारण गंभीर संकट में फंस गए हैं। प्रशासनिक दबाव इतना बढ़ गया है कि लक्ष्य पूरे न करने पर निलंबन की कार्रवाई की धमकी दी जा रही है, जिसे कई सचिव और उनके संघ शासन-प्रशासन का स्पष्ट अत्याचार मान रहे हैं। जिले की ग्रामीण पंचायतों से मिली रिपोर्ट्स के अनुसार, यह नीति न केवल कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है, बल्कि ग्रामीण विकास की मूल भावना को भी कमजोर कर रही है। हाल ही में जिले के पंचायत सचिवों को समग्र ई-केवाईसी में लापरवाही के आरोप में निलंबित किया गया, जो नीमच जैसे जिलों में भी इसी तरह की कार्रवाई की आशंका पैदा कर रहा है।
पंचायत सचिवों पर ई-केवाईसी के लक्ष्यों को पूरा करने का इतना जबरदस्त दबाव है कि वे मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुके हैं। एक स्थानीय सचिव, जिन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बात की, ने बताया, “रोजाना नए टारगेट मिलते हैं, लेकिन ग्रामीणों की जागरूकता की कमी और संसाधनों की अनुपलब्धता के कारण काम असंभव लगता है। ऊपर से निलंबन की धमकी ने नींद उड़ा दी है।” जिले में करीब 200 से अधिक पंचायत सचिव इस दबाव से जूझ रहे हैं, जहां ई-केवाईसी को पेंशन योजनाओं, जैसे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन और अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ा गया है। सरकार ने 31 अगस्त 2025 तक ई-केवाईसी पूरा करने का अल्टीमेटम दिया है, अन्यथा पेंशन रोकने की चेतावनी जारी की गई है, लेकिन इस बोझ को पंचायत स्तर पर सचिवों पर डाल दिया गया है।
ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में डिजिटल प्रक्रियाओं के प्रति जागरूकता का अभाव एक प्रमुख बाधा है। नीमच के दूरदराज के गांवों में इंटरनेट कनेक्टिविटी कमजोर है, और बुजुर्ग या अनपढ़ ग्रामीण ई-केवाईसी की जटिलताओं को समझ नहीं पाते। “हम घर-घर जाकर समझाते हैं, लेकिन आधार प्रमाणीकरण या बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन में तकनीकी समस्याएं आती हैं,” एक सचिव ने कहा। इस जागरूकता की कमी के कारण लक्ष्य पूर्ति में भारी देरी हो रही है, लेकिन प्रशासन इसे सचिवों की लापरवाही मानकर निलंबन की कार्रवाई की धमकी दे रहा है। शहडोल जिले में हाल ही में 35 पंचायत सचिवों और ग्राम रोजगार सहायकों को ई-केवाईसी में लापरवाही पर कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जो इस नीति की कठोरता को दर्शाता है।
इसके अलावा, सीमित समय में पंचायत स्तर पर अन्य जनकल्याणकारी योजनाओं और विकास कार्यों को लागू करना भी ई-केवाईसी लक्ष्यों में बड़ी रुकावट बन रहा है। सचिवों को मनरेगा, स्वच्छ भारत मिशन, जल जीवन मिशन, और ग्रामीण सड़क निर्माण जैसे कार्यों को संभालना पड़ता है, जो पहले से ही उनके कार्यभार को भारी बना देते हैं। “एक व्यक्ति को सब कुछ संभालना पड़ता है, स्टाफ की कमी है, और ऊपर से ई-केवाईसी का अतिरिक्त बोझ,” उन्होंने शिकायत की। भिकंगांव में जिला पंचायत सीईओ ने ई-केवाईसी में धीमी प्रगति पर सैलरी रोकने और टर्मिनेशन की धमकी दी, जो नीमच में भी इसी तरह की स्थिति पैदा कर रहा है। निजी जीवन के पहलू जैसे परिवार की देखभाल, स्वास्थ्य समस्याएं, आवागमन की कठिनाइयां, और मौसम की अनिश्चितता (जैसे मानसून में गांवों तक पहुंचना) भी इस दबाव को कई गुना बढ़ा रही हैं।
“बारिश में सड़कें खराब हो जाती हैं, और स्वास्थ्य खराब होने पर काम कैसे करें? लेकिन टारगेट पूरे न होने पर निलंबन की तलवार लटकती रहती है,” एक अन्य सचिव ने दर्द बयां किया।
सचिवों की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि शासन, प्रशासन और नेताओं के लिए नियम बनाना आसान है, लेकिन इन्हें जमीनी स्तर पर लागू करना बेहद मुश्किल। “ऊपर से आदेश आते हैं, लेकिन स्थानीय परिस्थितियों को नजरअंदाज किया जाता है,” उन्होंने कहा। मध्य प्रदेश पंचायत सेवा (अनुशासन एवं अपील) नियम, 1999 के तहत निलंबन की कार्रवाई को वैध माना जाता है, लेकिन कई सचिव इसे अत्याचार का रूप मानते हैं क्योंकि यह उनकी निजी और व्यावसायिक जिंदगी को तबाह कर देता है। पंचायतों में अन्य विभागों के कार्यों को भी सचिवों पर थोप दिया जाता है, जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा या कृषि संबंधी योजनाएं, जो उनकी मुख्य जिम्मेदारियों को प्रभावित करती हैं। पेंशन योजनाओं के तहत 3.5 लाख लाभार्थियों को ई-केवाईसी पूरा करने का दबाव है, लेकिन इसकी जिम्मेदारी पूरी तरह पंचायत सचिवों पर डालना अन्यायपूर्ण है।
पंचायत सचिव संघ ने इस मुद्दे पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। संघ के एक प्रतिनिधि ने कहा, “यह प्रशासनिक अत्याचार है। निलंबन की प्रक्रिया से कर्मचारियों का मनोबल टूट रहा है, और ग्रामीण विकास प्रभावित हो रहा है। हमें अतिरिक्त स्टाफ, प्रशिक्षण और यथार्थवादी लक्ष्यों की जरूरत है।” विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया, तो यह समस्या पूरे राज्य में फैल सकती है, जहां पहले से ही ई-केवाईसी में लापरवाही पर कार्रवाई हो रही है।
यह मुद्दा नीमच जिले में ग्रामीण प्रशासन की गहरी चुनौतियों को उजागर करता है। सरकार से अपील है कि धरातल की वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए नीतियां बनाई जाएं, ताकि पंचायत सचिव बिना तनाव और अत्याचार के अपना कार्य कर सकें और ग्रामीण भारत का विकास सुचारू रूप से चल सके।